पुलिस मुख्यालय में हुआ करीब 4 करोड़ का घोटाला, कैसे किया फर्जीवाड़ा?,There was a scam of about Rs 4 crore in the police headquarters, how was the fraud committed?
पुलिस मुख्यालय में हुआ करीब 4 करोड़ का घोटाला कैसे किया फर्जीवाड़ा ?
भोपाल (मप्र)- मध्यप्रदेश के पुलिस मुख्यालय (PHQ) में फर्जी प्रो-लॉन्ग सर्टिफिकेट के नाम पर हुए घोटाले की रकम लगातार बढ़ती जा रही है, इस मेडिकल बिल घोटाले की रकम बढ़कर अब 4 करोड़ रुपए हो गई है। बताया जा रहा है कि यह घोटाला साल 2019 से 2024 के बीच किया गया था, जिसमें अब तक 40 कर्मचारियों के करीबन 75 से भी ज्यादा फर्जी सर्टिफिकेट सामने आ चुके हैं साथ बताया जा रहा है कि इस मामले में अभी गहन जांच चल रही है।
2019-2024 के बीच हुआ घोटाला
घोटाला साल 2019 से 2024 के बीच हुआ जहां पहले कुल 75 लाख की गड़बड़ी मिली थी । जांच शुरू हुई और जैसे-जैसे आगे बढ़ी तो यह घोटाला अब 4 करोड़ रुपए के आसपास पहुंच गया है। करीब 100 से ज्यादा सर्टिफिकेट खंगालने पर उसमें 40 से ज्यादा सर्टिफिकेट फर्जी निकले, ऐसे में माना जा रहा है कि इस घोटाले में दूसरे कर्मचारी भी शामिल हो सकते हैं, जिसमें वेलफेयर के साथ दूसरी शाखाओं के कर्मचारी भी जांच के दायरे में आ रहे हैं। हालांकि स्वास्थ्य विभाग की तरफ से कहा गया कि जो सर्टिफिकेट जारी हुए हैं वह उनके कार्यालय के नहीं हैं।
आखिर प्रो-लॉन्ग सर्टिफिकेट क्या होता है?
यह सर्टिफिकेट गंभीर बीमारियों के लिए बनता है, जिसमें कैंसर और टीबी जैसी बीमारियां रहती हैं, इस सर्टिफिकेट के जरिए सालभर के इलाज का प्रबंध होता है, ऐसे में यह सर्टिफिकेट भी सालभर के लिए जारी होता है, लेकिन समय-समय पर इसका नवीकरण करवाना होता है, ऐसे में बार-बार सर्टिफिकेट बनवाने के नाम पर यह करोड़ो का घोटाला किया गया है। कार्रवाई जारी है।
फर्जी बिल निकाले गए थे
बताया जा रहा है कि यह घोटाला पीएचक्यू (PHQ) की अकाउंट शाखा के कर्मचारियों ने किया था। अकाउंट शाखा में अधिकारी नीरज अहिरवार, क्लर्क हरिहर सोनी और हर्ष वानखेड़े ने मिलकर इस घोटाले को फर्जी बिलों के माध्यम से अंजाम दिया। मामले में एफआईआर होने के बाद तीनों आरोपियों को गिरफ्तार भी कर लिया गया था, फिलहाल तीनों करीब दो माह जेल में रहने के बाद जमानत पर बाहर आ गए हैं। उधर घोटाले की रकम भी बढ़ती जा रही है जो अब 4 करोड़ के आसपास पहुंच गई है। बताया जा रहा है कि इस घोटाले में करीब 40 फर्जी बिल निकाले गए थे जो धीरे-धीरे सामने आए हैं। क्लर्क हरिहर सोनी और हर्ष वानखेड़े ने स्वास्थ्य विभाग के 20 से 35 लाख रुपए के फर्जी सर्टिफिकेट बनाए, जिसमें जाली सील-साइन के जरिए बिल तैयार किए गए उसमें ट्रेजरी अधिकारी नीरज अहिरवार की भूमिका भी संदिग्ध मिली थी, क्योंकि एक ही बिल बार-बार अपलोड करके पैसा निकाला गया था। जांच पड़ताल में बात सामने आई कि कभी-कभी एक-दो घंटे के भीतर ही बिलों का ट्रांसफर किया गया, लेकिन सॉफ्टवेयर में बचने के लिए बिल में फॉन्ट के साइज बदल दिए जाते थे, ताकि कोई पकड़ न पाए, खास बात ये कि फॉन्ट के साइज बदलने से बिल बार-बार पास भी हो जाता था। फिलहाल कार्रवाई जारी है।




कोई टिप्पणी नहीं