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आपातकाल के 50 वर्ष, 25 जून का वो काला दिन जब देश में लगी इमरजेंसी, इंदिरा गांधी के एक फैसले से घोंट दिया गया लोकतंत्र का गला Emergency In India, 50 years of Emergency, that dark day of 25th June when Emergency was imposed in the country, democracy was strangled by a decision of Indira Gandhi.

आपातकाल के 50 वर्ष 25 जून का वो काला दिन जब देश में लगी इमरजेंसी  इंदिरा गांधी के एक फैसले से घोंट दिया गया लोकतंत्र का गला Emergency In India


सांकेतिक तस्वीर:सोशल मीडिया 
 21 महीने रहा देश में आपातकाल
         देश में 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक की 21 महीने की अवधि के लिए आपातकाल लागू था। 

सांकेतिक तस्वीर:सोशल मीडिया
18वीं लोकसभा के पहले दिन PM ने छेड़ा आपातकाल का जिक्र
      
आपातकाल 1975: 18वीं लोकसभा के पहले दिन सत्र के शुरू होने से आधे घंटे पहले ही पीएम नरेंद्र मोदी ने आपातकाल
 का जिक्र भी किया था । आज 25 जून को आपातकाल के 50 साल पूरे हो रहे हैं। पीएम ने कहा कि 25 जून भूलने वाला दिन नहीं है, इसी दिन संविधान को पूरी तरह नकार दिया गया था। 25 जून 1975 को 21 महीने के लिए इमरजेंसी लागू की गई थी जो करीब 21 मार्च 1977 तक चली थी। वह पूर्व पीएम इंदिरा गांधी की सरकार की मनमानियों का दौर माना जाता था। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत केंद्र में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार की सिफारिश पर आपातकाल की घोषणा कर दी थी।

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 शास्त्रीजी के निधन के बाद पीएम बनी थीं इंदिरा गांधी

             पूर्व पीएम लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद इंदिरा गांधी देश की पीएम बनीं थीं,जिनका कुछ वजहों से न्यायपालिका के साथ टकराव शुरू हो गया था। यह टकराव आपातकाल की पृष्ठभूमि बन गया। 

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कोर्ट में था एक मामला  
    दरअसल एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सुब्बाराव के नेतृत्व वाली एक बेंच ने 7 बनाम 6 जजों के बहुमत से फैसला सुनाया था, जिसमें कहा गया था कि संसद में दो तिहाई बहुमत के साथ भी किसी संविधान संशोधन के जरिये मूलभूत अधिकारों के प्रावधान न तो समाप्त किए जा सकते हैं और न ही इन्हें सीमित किया जा सकता है।

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आखिर इंदिरा गांधी ने क्यों लिया इमरजेंसी का फैसला?

       साल 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण को करारी शिकस्त दी थी,उन्होंने इंदिरा गांधी पर सरकारी मशीनरी और संसाधनों के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट में मामला दायर किया था। 12 जून 1975 हाई कोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी को दोषी मानते हुए उनका निर्वाचन अवैध करार दिया साथ ही 6 साल के लिए उनके कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई। इसके बाद इंदिरा गांधी के पास प्रधानमंत्री का पद छोड़ने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं बचा था।

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 कोर्ट के निर्णय,उभरते नेताओं से थी इंदिरा की नाराजगी
       इंदिरा गांधी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया लेकिन वहां पर भी सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस कृष्णा अय्यर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाई। कोर्ट ने केवल इंदिरा गांधी को पीएम बने रहने की इजाजत दी। आखिरी फैसला आने तक उन्हें सांसद के तौर पर वोट डालने का अधिकार नहीं था। दूसरा कारण यह था कि जय प्रकाश नारायण कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे जो काफी तेजी से बढ़ता जा रहा था। जेपी ने कोर्ट के इंदिरा गांधी को पीएम पद से हटने के आदेश का हवाला देकर स्टूडेंट, सैनिक और पुलिस से सरकार के आदेश न मानने का आग्रह किया। इस सबसे इंदिरा गांधी बेहद नाराज हो गईं। उन्होंने बिना कैबिनेट मीटिंग के ही आपातकाल लगाने की सिफारिश राष्ट्रपति से कर दी। जिसपर तत्कालीन राष्ट्रपति ने 25 और 26 जून की मध्य रात्रि ही अपने साइन कर दिए और पूरे देश में इमरजेंसी लागू हो गई।

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लोगों को मीसा के तहत डाला गया जेल में 

     आजाद भारत के इतिहास में इमरजेंसी एक काला इसलिए बन गया, क्योंकि इस दौरान मीसा अर्थात मेंटेनेंस ऑफ इंटर्नल सिक्योरिटी एक्ट (The Maintenance of Internal Security Act) के तहत लोगों को जेल में डालने की सरकार को बेलगाम छूट मिल गई। असहमति को सख्ती से कुचल दिया गया और नागरिक स्वतंत्रता को सरकार की ओर से रौंदने का काम किया गया। 21 महीने जब तक इमरजेंसी लागू रही, मानवाधिकारों के उल्लंघन और प्रेस पर दमनकारी वाली सेंसरशिप तक की खबरें आती रहीं।

सांकेतिक तस्वीर:सोशल मीडिया
लागू हुई मीडिया पर सेंसरशिप

       इमरजेंसी लागू होने के बाद लोगों के मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था। साथ ही साथ, मेंटेनेंस ऑफ इंटर्नल सिक्योरिटी एक्ट (मीसा) के तहत सभी विपक्षी दलों के नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। इसमें जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नाडीस जैसे दिग्गज नेता शामिल रहे और इतना ही नहीं, मीडिया पर सेंशरशिप भी लागू कर दी गई। हर अखबार में सेंसर अधिकारी बैठा दिया गया, उसकी इजाजत के बाद ही कोई समाचार छप सकता था। सरकार विरोधी समाचार छापने पर गिरफ्तारी होती थी। कई पत्रकारों को मीसा और डीआईआर के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था। सरकार की कोशिश थी कि लोगों तक सही जानकारी न पहुंचे। आपातकाल की मियाद छह महीने तक रहती है जिसके बाद चुनाव होना चाहिए था, लेकिन इंदिरा गांधी ने चुनाव टालते-टालते 18 महीने का समय ले लिया था।

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  24 संगठनों पर बैन लगा
         आरएसएस समेत 24 संगठनों पर बैन लगा दिया गया था। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इमरजेंसी लागू करने के पीछे इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी का भी बहुत बड़ा रोल रहा था। इंदिरा गांधी ,संजय गांधी के कहने पर ही सारे फैसले लेती गईं थीं, जिसमें लोगों की जबरन नसबंदी करवाने का फैसला भी शामिल था।

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लोगों ने इमरजेंसी का लिया बदला

21 मार्च 1977 को इमरजेंसी समाप्त हो गई थी। आपातकाल के बाद 1977 में भारत में छठे लोकसभा चुनाव हुए। इस आम चुनाव में जनता ने पहली गैरकांग्रेसी सरकार को चुनकर मानो इमरजेंसी के दौरान हुए सभी जुल्मो-सितम का हिसाब ले लिया था। जनता ने कांग्रेस को हराकर सत्ता की चाबी जनता पार्टी के हाथों में दे दी। फिर कांग्रेस से ही अलग हुए 81 साल के मोरारजी देसाई को पहला गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री चुना गया। ये आजादी के तीस साल बाद बनी पहली गैर कांग्रेसी सरकार थी। इंदिरा गांधी खुद रायबरेली की सीट हार गईं और कांग्रेस 153 सीटों पर ही सिमट कर रह गई।

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