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किसानों का फिर दिल्ली कूच,विपक्ष का समर्थन मिलना कहीं राजनीति से प्रेरित तो नहीं? Farmers march to Delhi again, getting support from opposition, is it politically motivated?

किसानों का फिर दिल्ली कूच,विपक्ष का समर्थन कहीं राजनीति से प्रेरित तो नहीं ? 

                                     फोटो: सोशल मीडिया

2021-22 में किसान अपने लंबे आंदोलन के बाद मोदी सरकार से कृषि कानूनों को निरस्त करवाने में कामयाब रहे थे. अब लोकसभा चुनाव से ठीक पहले किसान एक बार फिर अपनी मांगों के लिए सड़क पर उतर आए हैं.

फोटो: सोशल मीडिया

किसानों का दिल्ली कूच

मोदी सरकार ने हाल ही में किसानों के मसीहा कहे जाने वाले चौधरी चरण सिंह और एम एस स्वामीनाथन को भारत रत्न देने का ऐलान किया. लेकिन शायद सरकार का ये दांव फेल हो गया, क्योंकि किसान यूनियनों ने मोदी सरकार के खिलाफ एक बार फिर आंदोलन पर अडिग हैं. नवंबर 2021 में किसानों ने आंदोलन खत्म किया था, लेकिन दो साल बाद वह फिर सड़कों पर हैं.संयुक्त किसान मोर्चा ने 13 फरवरी को दिल्ली कूच का ऐलान किया है. किसान यूनियनों ने 'दिल्ली चलो' का नारा दिया है. मंगलवार को पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के लाखों किसानों के दिल्ली की ओर कूच करने की अटकलें हैं.

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वहीं, संयुक्त किसान मोर्चा ने 16 फरवरी को एक दिन के लिए ग्रामीण भारत बंद का आह्वान भी किया है.

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क्यों फिर दिल्ली कूच कर रहे किसान?

ये पहली बार नहीं है जब किसान आंदोलन कर रहे हैं. दो साल पहले दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का ऐतिहासिक आंदोलन हुआ था तब मोदी सरकार को किसानों के आगे घुटने टेकने पड़े थे और संसद से पारित तीन कृषि कानूनों को रद्द करना पड़ा था.किसानों का डर था कि ये कानून न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को खत्म कर सकते हैं और खेती-किसानी कॉर्पोरेट कंपनियों के हाथों में सौंप जा सकते हैं. हालांकि, कृषि कानूनों को लेकर किसानों को बड़ी कुर्बानी देनी पड़ी. किसान करीब एक साल तक लगातार धरना प्रदर्शन करते रहे. किसानों को दावा है कि इस आंदोलन के दौरान 700 से ज्यादा किसानों की मौत हो गई, हालांकि, सरकार और गैर सरकारी सतह पर इन दावों को अहमियत नहीं मिली.दो साल पहले सरकार ने न सिर्फ कानूनों को रद्द कर दिया, बल्कि एमएसपी पर गारंटी देने का वादा किया. इसके बाद किसानों ने आंदोलन वापस ले लिया था. लेकिन अब किसानों का कहना है कि सरकार ने एमएसपी को लेकर अपने वादे पूरे नहीं किए. 

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किसानों की क्या है मांग?

2021 के आंदोलन की तरह ही इस बार भी अपनी कई मांगों के लिए किसान विरोध प्रदर्शन के लिए उतर रहे हैं. खास तौर से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी को लेकर कानून बनाने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है. न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए कानून बनाना उनकी सबसे बड़ी मांग है.

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संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि वह केंद्र सरकार को सिर्फ उनके दो साल पहले किए गए वादों को याद दिलाना चाहते हैं जो किसानों से आंदोलन वापस लेने की अपील करते हुए सरकार ने किए थे. वो वादे अबतक पूरे नहीं हुए हैं. सरकार ने एमएसपी पर गारंटी का वादा किया था. किसानों के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लेने की बात कही थी. 


2021 में लखीमपुरी खीरी में कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे चार सिख किसानों को कथित तौर पर गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी की गाड़ी ने कुचल दिया था. किसान सरकार से उस घटना में मारे गए लोगों के परिवार को नौकरी और दोषियों को सजा दिलाने की मांग कर रहे हैं.संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा, "सरकार ने सबसे बड़ा वादा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक किसानों को फसल के दाम देने का वादा किया था. सरकार ने  एम एस स्वामीनाथन को भारत रत्न से सम्मानित कर दिया लेकिन उनकी रिपोर्ट को लागू नहीं कर रही. इसके अलावा किसानों को प्रदूषण कानून से मुक्त रखने का वादा किया था. लेकिन कोई भी वादा पूरा नहीं किया गया."आपको बता दें, स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में किसानों को उनकी फसल की लागत से डेढ़ गुना कीमत देने की सिफारिश की गई है.
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दिल्ली कूच कर रहे किसानों के आरोप 

मजदूर मोर्चा के एक प्रदर्शनकारी किसान ने एक्स पर कहा, किसानों का ट्रैक्टर मार्च शुरू हो चुका है. हजारों किसान दिल्ली पहुंच रहे हैं. हम रास्ते में कोई ट्रैफिक जाम नहीं कर रहे हैं. पूरे अनुशासन के साथ दिल्ली कूच किया जा रहा है. एमएसपी एक अहम मुद्दा है. सरकार ने बॉर्डर सील कर दिए हैं. लगातार धर-पकड़ की जा रही है. हमारी बात सुनी नहीं जा रही है. मजदूर इस देश की सबसे बड़ी ताकत है. बैरिकैड तोड़ने का हमें पूरा तजुर्बा है. सरकार रोक रही है, जनता को परेशान कर रही है.प्रदर्शनकारी किसानों का आरोप है कि दिल्ली कूच में शामिल होने आ रहे कर्नाटक के किसानों को भोपाल में ट्रेन रोककर गिरफ्तार किया गया. उनके साथ मारपीट करने का आरोप लगाया. इस कारण एक किसान के सिर पर गंभीर चोट भी आई.

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किसानों को रोकने के लिए बॉर्डर पर कैसे कैसे इंतजाम

किसानों के 'दिल्ली चलो' मार्च को देखते हुए राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर सुरक्षा कड़ी कर दी गई है. यूपी, हरियाणा और दिल्ली पुलिस अलर्ट पर है. मार्च को रोकने के मकसद से सिंघु और गाजीपुर सहित सारी सीमाओं को सील कर दिया है. अंबाला के पास शंभू में पंजाब से लगी सीमा सील कर दी गई.विरोध-प्रदर्शन के मद्देनजर सभी सीमावर्ती रास्तों पर पुलिस और केंद्रीय बलों की टुकड़ियां तैनात की गई है. करीब 5 हजार सुरक्षा कर्मियों को तैनात किया गया है. जबकि कटीले और नुकीले तार लगाकार किसानों का रास्ता रोकने की तैयारी है. सीसीटीवी और लाउडस्पीकर भी लगाए गए हैं. दिल्ली-हरियाणा की सीमा पर आठ लेयर की दीवारें खड़ी की गई हैं. कुछ सड़कों पर पत्थर के बड़े-बड़े बेरिकेड और लोहे के कंटेनर लगा दिए हैं. किसानों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पानी की बौछार करने के भी इंतजाम है . साथ ही सोशल मीडिया की हर गतिविध को मॉनिटर किया जा रहा है.

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कानून उल्लंघन करने वाले होंगे गिरफ्तार

दिल्ली पुलिस कमिश्नर संजय अरोड़ा की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि राजधानी दिल्ली में ट्रैक्टरों के प्रवेश पर प्रतिबंध है. बंदूक, ज्वलनशील पदार्थ, ईंट, पत्थर जैसे अस्थायी हथियार रखने पर प्रतिबंध है. पेट्रोल और सोडा की बोतल इक्कठा करने पर भी रोक है. इसके अलावा अगले एक महीने तक लाउड स्पीकर के इस्तेमाल पर मनाही है. राजधानी में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूरी दिल्ली में 12 मार्च तक धारा-144 लागू कर दी गई है. किसी तरह की भी भीड़ जुटने पर पाबंदी है. धारा-144 का उल्लंघन करने वालों की तुरंत गिरफ्तारी का आदेश दिया गया है. किसी को भी कानून का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं है.वहीं हरियाणा प्रशासन ने सिरसा के चौधरी दलबीर सिंह इंडोर स्टेडियम और गुरु गोविंद सिंह स्टेडियम को अस्थायी जेल बना दिया है. उपद्रव करने वाले किसानों को गिरफ्तार कर इन अस्थायी जेल में रखा जा सकता है.

दिल्ली पुलिस की ट्रैफिक एडवाइजरी

राजधानी की सभी सीमाओं के लिए दिल्ली पुलिस ने ट्रैफिक एडवाइजरी जारी की है. भारी वाहनों के दिल्ली में प्रवेश पर रोक लगा दी गई है. साथ ही हल्के वाहनों को मुख्य बॉर्डर की बजाय आसपास स्थानीय बॉर्डर से दिल्ली आने-जाने के लिए इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है.

हरियाणा के 7 जिलों में इंटरेनट बंद

किसानों के दिल्ली कूच से दो दिन पहले ही हरियाणा के 7 जिलों में इंटरेनट और एसएमएस सेवा बंद कर दी गई. हरियाणा के अंबाला, कुरुक्षेत्र, कैथल, जींद, हिसार, फतेहाबाद और सिरसा जिले में तीन दिन तक के लिए इंटरनेट सेवा बंद रखने का फैसला हुआ है. 

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किसानों के दिल्ली मार्च पर राजनीति

दिल्ली कूच के आह्वान पर किसानों को विपक्ष का साथ मिल रहा है. विपक्ष सरकार पर अन्नदाता को रोकने का आरोप लगा रहा है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी मोदी सरकार पर किसानों को ठगने का आरोप लगाया है. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, '10 सालों से दिन रात झूठ की खेती करने वाले मोदी ने किसानों को सिर्फ ठगा है. दो गुनी आमदनी का वादा कर मोदी ने अन्नदाताओं को MSP के लिए तरसाया है.'राहुल गांधी ने आगे कहा, 'किसान महंगाई तले दबे हैं. फसलों का सही दाम न मिलने के कारण उनके कर्जे 60 फीसदी बढ़ गए. इसका नतीजा ये हुआ कि लगभग 30 किसानों ने हर दिन अपनी जान गंवाई. जिसकी USP धोखा देना है, वो MSP के नाम पर किसानों के साथ सिर्फ राजनीति कर सकता है, न्याय नहीं. किसानों की राह में कीलें बिछाने वाले भरोसे के लायक नहीं.'

      किसानों के दिल्ली कूच पर हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज ने कहा है कि राज्य के लोगों की सुरक्षा करने और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए कुछ भी करेंगे. साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि बातचीत से बडे़-बड़े मुद्दे हल हो जाते हैं, यह भी हल हो जाएगा।

एक सवाल यह भी उठता है कि क्‍या सरकार की तरफ से किसानों के लिए एमएसपी गारंटी कानून बनाया जाना संभव भी है??

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क्‍या कहते हैं आंकड़े ?

तीन आंकड़े ही इस पूरी कहानी को खारिज कर सकते हैं.एक,कृषि उपज का कुल मूल्य रु. 40 लाख करोड़ होना तो वित्‍तीय वर्ष 2020 में तय किया गया था. इसमें डेयरी, खेती, बागवानी, पशुधन और एमएसपी फसलों के उत्पाद शामिल हैं. दूसरा कुल कृषि उपज का बाजार मूल्य रु. 10 लाख करोड़ का होना. इनमें 24 फसलें शामिल हैं जो एमएसपी के दायरे में शामिल हैं. पिछले दो-तीन सालों से लोगों को यह भरोसा दिलाया गया है कि एमएसपी भारत के कृषि कार्यों का अभिन्न अंग है. हालांकि, यह सच्चाई से बहुत दूर है. कुल एमएसपी खरीद रु. 2.5 लाख करोड़, यानी कुल कृषि उपज का 6.25 प्रतिशत और एमएसपी के तहत उपज का करीब 25 प्रतिशत है. 

 राजनीति से प्रेरित तर्क? 

अब,अगर एमएसपी गारंटी कानून लाया जाता है तो सरकार कम से कम हर साल 10 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च देख रही होगी. चीजों को परिप्रेक्ष्य में रखने के लिए, यह लगभग उस खर्च 11.11 लाख करोड़ रुपए के बराबर है जो इस सरकार ने हाल के अंतरिम बजट में बुनियादी ढांचे के लिए अलग रखा है.  10 लाख करोड़ रुपए पिछले सात वित्तीय वर्षों में हमारे बुनियादी ढांचे पर किए गए वार्षिक औसत व्यय (2016 और 2023 के बीच 67 लाख करोड़ रुपए) से भी अधिक है. साफ है कि सार्वभौमिक एमएसपी मांग का कोई आर्थिक या राजकोषीय अर्थ नहीं है.  यह सरकार के खिलाफ एक राजनीति से प्रेरित तर्क है जिसका पिछले दस वर्षों में व्यापक कल्याण रिकॉर्ड रहा है. भले ही, तर्क के लिए, कोई यह मान ले कि लागत सरकार की तरफ से उठाई जा सकती है तो सवाल उठता है कि 10 लाख करोड़ रुपए कहां से आएगा पैसा? क्या हम, नागरिक के रूप में, बुनियादी ढांचे और रक्षा में सरकारी खर्च को उल्लेखनीय रूप से कम करने, या प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से अधिक कराधान के विचार से सहमत हैं?

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पटरी से उतर जाएगी अर्थव्‍यवस्‍था...?

साफ तौर पर समस्या कृषि या आर्थिक नहीं है, और पूरी तरह से राजनीतिक है और साल 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले किया गया एक प्रयास है. व्यापक भ्रष्टाचार के रडार के तहत कई राजनीतिक दलों की तरफ से इसका समर्थन किया गया था. साल 2025 के वित्‍तीय वर्ष में 45 लाख करोड़ रुपए वाले बजट से 10 लाख करोड़ रुपए खर्च करने का सिर्फ विचार ही एक वित्तीय आपदा के बराबर है जो स्पष्ट रूप से हमारी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार देगा।

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